मेरा खेल साथ तुम्हारे जब होता था
तब, कौन हो तुम, यह किसे पता था।
तब, नहीं था भय, नहीं थी लाज मन में, पर
जीवन अशांत बहता जाता था
तुमने सुबह-सवेरे कितनी ही आवाज लगाई
ऐसे जैसे मैं हूँ सखी तुम्हारी
हँसकर साथ तुम्हारे रही दौड़ती फिरती
उस दिन कितने ही वन-वनांत।
ओहो, उस दिन तुमने गाए जो भी गान
उनका कुछ भी अर्थ किसे पता था।
केवल उनके संग गाते थे मेरे प्राण,
सदा नाचता हृदय अशांत।
हठात् खेल के अंत में आज देखूँ कैसी छवि--
स्तब्ध आकाश, नीरव शशि-रवि,
तुम्हारे चरणों में होकर नत-नयन
एकांत खड़ा है भुवन।
हिन्दी गीतांजलि
बांग्ला भाषा में गीत-संग्रह 'गीतांजलि' के रचयिता विश्वप्रतिष्ठ कवि, कथाकार, नाटककार, शिक्षाशास्त्री, विचारक और चित्रकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। इसका प्रथम प्रकाशन 1910 ई. के सितंबर महीने में इंडियन पब्लिकेशन हाउस, कोलकाता द्वारा किया गया था। स्वयं कवि द्वारा अंग्रेजी गद्य में रूपांतरित इस कृति को 1913 ई. के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यहॉं बांग्ला 'गीतांजलि' के गीतों के हिन्दी अनुवाद की क्रमवार प्रस्तुति की जा रही है। ये अनुवाद देवेन्द्र कुमार देवेश द्वारा किए गए हैं।
Wednesday, April 4, 2012
Tuesday, April 3, 2012
गीत 67
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज
लेकर हाथों में अरुणवर्णी पारिजात।
सोई थी नगरी, पथिक नहीं थे पथ पर,
चले गए अकेले, अपने सोने के रथ पर-
ठिठक कर एक बार मेरे वातायन की ओर
किया था तुमने अपना करुण दृष्टिपात।
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।
स्वप्न मेरा किस गंध से हुआ सुवासित,
किस आनंद से कॉंप उठा घर का अँधेरा,
धूल में पड़ी नीरव मेरी वीणा
बज उठी अनाहत, पाकर कौन-सा आघात।
कितनी ही बार सोचा मैंने--उठ पड़ूँ,
आलस त्याग पथ पर जा दौड़ूँ,
उठी जब, तब तुम थे चले गए--
अब तो शायद न होगा तुमसे साक्षात्
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।
लेकर हाथों में अरुणवर्णी पारिजात।
सोई थी नगरी, पथिक नहीं थे पथ पर,
चले गए अकेले, अपने सोने के रथ पर-
ठिठक कर एक बार मेरे वातायन की ओर
किया था तुमने अपना करुण दृष्टिपात।
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।
स्वप्न मेरा किस गंध से हुआ सुवासित,
किस आनंद से कॉंप उठा घर का अँधेरा,
धूल में पड़ी नीरव मेरी वीणा
बज उठी अनाहत, पाकर कौन-सा आघात।
कितनी ही बार सोचा मैंने--उठ पड़ूँ,
आलस त्याग पथ पर जा दौड़ूँ,
उठी जब, तब तुम थे चले गए--
अब तो शायद न होगा तुमसे साक्षात्
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।
Thursday, March 29, 2012
गीत 66
वहन कर सकूँ प्रेम तुम्हारा
ऐसी सामर्थ्य नहीं।
इसीलिए इस संसार में
मेरे-तुम्हारे बीच
कृपाकर तुमने रखे नाथ
अनेक व्यवधान-
दुख-सुख के अनेक बंधन
धन-जन-मान।
ओट में रहकर क्षण-क्षण
झलक दिखाते ऐसे-
काले मेघों की फॉंको से
रवि मृदुरेखा जैसे।
शक्ति जिन्हें देते ढोने की
असीम प्रेम का भार
एक बार ही सारे परदे
देते हो उतार।
न रखते उन पर घर के बंधन
न रखते उनके धन
नि:शेष बनाकर पथ पर लाकर
करते उन्हें अकिंचन।
न व्यापता उन्हें मान-अपमान
लज्जा-शरम-भय।
अकेले तुम सब कुछ उनके
विश्व-भुवनमय।
इसी तरह आमने-सामने
सम्मुख तुम्हारा रहना,
केवल मात्र तुम्हीं में प्राण
परिपूर्ण कर रखना,
यह दया तुम्हारी पाई जिसने
उसका लोभ असीम
सकल लोभ वह दूर हटाता
देने को तुमको स्थान।
ऐसी सामर्थ्य नहीं।
इसीलिए इस संसार में
मेरे-तुम्हारे बीच
कृपाकर तुमने रखे नाथ
अनेक व्यवधान-
दुख-सुख के अनेक बंधन
धन-जन-मान।
ओट में रहकर क्षण-क्षण
झलक दिखाते ऐसे-
काले मेघों की फॉंको से
रवि मृदुरेखा जैसे।
शक्ति जिन्हें देते ढोने की
असीम प्रेम का भार
एक बार ही सारे परदे
देते हो उतार।
न रखते उन पर घर के बंधन
न रखते उनके धन
नि:शेष बनाकर पथ पर लाकर
करते उन्हें अकिंचन।
न व्यापता उन्हें मान-अपमान
लज्जा-शरम-भय।
अकेले तुम सब कुछ उनके
विश्व-भुवनमय।
इसी तरह आमने-सामने
सम्मुख तुम्हारा रहना,
केवल मात्र तुम्हीं में प्राण
परिपूर्ण कर रखना,
यह दया तुम्हारी पाई जिसने
उसका लोभ असीम
सकल लोभ वह दूर हटाता
देने को तुमको स्थान।
Thursday, December 8, 2011
गीत 65
जाने कब मैं बाहर निकली गान तुम्हारे ही गाते--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
भूल गई हूँ जाने कब से चाहत तुम्हारी मन में--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
झरना जैसे बाहर निकलता
किसकी चाहत नहीं जानता
वैसे ही आई हूँ दौड़ी
जीवनधारा के संग बहती
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
कितने ही नामों से रही पुकारती
कितनहीं छवियॉं रही ऑंकती
जाने किस आनंद में चलती रही
उसका ठिकाना पाए बिना--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
पुष्प जैसे प्रकाश के लिए
काटे अबोध जगकर के रात
वैसे ही तुम्हारी चाहत में
मेरा हृदय पड़ा है बिछकर
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
भूल गई हूँ जाने कब से चाहत तुम्हारी मन में--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
झरना जैसे बाहर निकलता
किसकी चाहत नहीं जानता
वैसे ही आई हूँ दौड़ी
जीवनधारा के संग बहती
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
कितने ही नामों से रही पुकारती
कितनहीं छवियॉं रही ऑंकती
जाने किस आनंद में चलती रही
उसका ठिकाना पाए बिना--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
पुष्प जैसे प्रकाश के लिए
काटे अबोध जगकर के रात
वैसे ही तुम्हारी चाहत में
मेरा हृदय पड़ा है बिछकर
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
Tuesday, November 29, 2011
गीत 64
एक-एक कर अपने
खोलो तार पुराने, खोलो तार पुराने
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
खत्म हो गया दिन का मेला
सभा जुड़ेगी संध्या बेला
अंतिम सुर जो छेड़ेगा, उसके
आने की यह आ गई बेला--
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
द्वार खोल दो अपने हे
अंधेरे आकाश के ऊपर से
सात लोकों की नीरवता
आए तुम्हारे घर में।
इतने दिनों तक गाया जो गान
आज हो जाए उसका अवसान
यह साज है तुम्हारा साज
इस बात को ही दो बिसार
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
खोलो तार पुराने, खोलो तार पुराने
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
खत्म हो गया दिन का मेला
सभा जुड़ेगी संध्या बेला
अंतिम सुर जो छेड़ेगा, उसके
आने की यह आ गई बेला--
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
द्वार खोल दो अपने हे
अंधेरे आकाश के ऊपर से
सात लोकों की नीरवता
आए तुम्हारे घर में।
इतने दिनों तक गाया जो गान
आज हो जाए उसका अवसान
यह साज है तुम्हारा साज
इस बात को ही दो बिसार
साधो यह सितार, बॉंधकर नए तार।
Tuesday, July 26, 2011
गीत 63 : मेनेछि हार मेनेछि
मान ली, हार मान गई।
जितना ही तुमको दूर ढकेला
उतनी ही मैं दूर भई।
मेरे चित्ताकाश से
तुम्हे जो कोई दूर रखे
कैसे भी यह सह्य नहीं
हर बार ही जान गई।
अतीत जीवन की छाया बन
चलता पीछे-पीछे,
अनगिन माया बजाकर वंशी
व्यर्थ ही पुकारें मुझे।
सब छूटे, पाकर साथ तुम्हारा
अब हाथों में डोर तुम्हारे
जो है मेरा इस जीवन में
लेकर आई द्वार तुम्हारे।
जितना ही तुमको दूर ढकेला
उतनी ही मैं दूर भई।
मेरे चित्ताकाश से
तुम्हे जो कोई दूर रखे
कैसे भी यह सह्य नहीं
हर बार ही जान गई।
अतीत जीवन की छाया बन
चलता पीछे-पीछे,
अनगिन माया बजाकर वंशी
व्यर्थ ही पुकारें मुझे।
सब छूटे, पाकर साथ तुम्हारा
अब हाथों में डोर तुम्हारे
जो है मेरा इस जीवन में
लेकर आई द्वार तुम्हारे।
Thursday, July 21, 2011
गीत 62 : तोरा शुनिस नि कि शुनिस नि
तुमने सुनी नहीं क्या सुनी नहीं, उसके पैरों की ध्वनि
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
युग-युग में, पल-पल में दिन-रात
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
गाए हैं गान जब भी जितने
अपनी धुन में पागल होकर
सकल सुरों में गूँजित उसकी ही
आगमनी--
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
युगों-युगों से फागुन-दिन में, वन के पथ पर
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
सावन के अनगिन अंधकार में बादल-रथ पर
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
दुख के बाद, चरम दुख में
उसकी ही पगध्वनि आती हिय में
सुख में जाने कब परस कराता
पारसमणि।
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
युग-युग में, पल-पल में दिन-रात
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
गाए हैं गान जब भी जितने
अपनी धुन में पागल होकर
सकल सुरों में गूँजित उसकी ही
आगमनी--
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
युगों-युगों से फागुन-दिन में, वन के पथ पर
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
सावन के अनगिन अंधकार में बादल-रथ पर
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
दुख के बाद, चरम दुख में
उसकी ही पगध्वनि आती हिय में
सुख में जाने कब परस कराता
पारसमणि।
वह तो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है।
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